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ओडिशा का गोटीपुआ नृत्य: ओडिसी की जड़ें इसी लोक परंपरा में छिपी हैं छोटे लड़के महिलाओं का वेश धारण कर करते हैं भक्ति और एक्रोबैटिक्स से भरा अनोखा नृत्य

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ADHUNIK NEWS ,29 August 2026, (Update 6 October 2026, 2:40 PM UTC)
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ओडिशा के नृत्य का नाम सुनते ही सबसे पहले शास्त्रीय ओडिसी डांस का ख्याल आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओडिसी नृत्य की जड़ें एक प्राचीन लोक नृत्य गोटीपुआ में छिपी हैं? माना जाता है कि शास्त्रीय ओडिसी भी इसी गोटीपुआ परंपरा से प्रेरित होकर विकसित हुआ। गोटीपुआ में भक्ति, कला, योग और एक्रोबैटिक्स का अनोखा संगम देखने को मिलता है।

ओडिशा के नृत्य का नाम सुनते ही सबसे पहले शास्त्रीय ओडिसी डांस का ख्याल आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओडिसी नृत्य की जड़ें एक प्राचीन लोक नृत्य गोटीपुआ में छिपी हैं? माना जाता है कि शास्त्रीय ओडिसी भी इसी गोटीपुआ परंपरा से प्रेरित होकर विकसित हुआ। गोटीपुआ में भक्ति, कला, योग और एक्रोबैटिक्स का अनोखा संगम देखने को मिलता है। आइए विस्तार से जानते हैं इस नृत्य की कहानी, इसकी खासियत और इसे करने का तरीका।

गोटीपुआ का मतलब क्या है?
ओड़िया भाषा में ‘गोटी’ का अर्थ होता है एक या अकेला और ‘पुआ’ का मतलब होता है लड़का। इस लोक नृत्य की शुरुआत में सिर्फ एक लड़का ही इसे प्रस्तुत करता था, इसलिए इसका नाम गोटीपुआ पड़ा। हालांकि समय के साथ अब इसे समूह में भी किया जाने लगा है। आज भी यह नृत्य मुख्य रूप से छोटे लड़कों द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है।

कैसे हुई इसकी शुरुआत?
गोटीपुआ नृत्य की शुरुआत 16वीं शताब्दी में भोई राजवंश के राजा रामचंद्र देव के शासनकाल में हुई मानी जाती है। उस समय पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर में भगवान की सेवा के लिए महारी या देवदासी परंपरा प्रचलित थी। विदेशी आक्रमणों और सामाजिक बदलावों के कारण महारी परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होने लगी।
इस कला को जीवित रखने के लिए अखाड़ा संस्कृति की शुरुआत हुई। अखाड़ों में छोटे लड़कों को यह नृत्य सिखाया जाने लगा। वैष्णव संत श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन से प्रेरित होकर छोटी उम्र के लड़कों को महिलाओं के रूप में सजाकर मंदिर के सामने भगवान जगन्नाथ की आराधना के लिए गोटीपुआ नृत्य कराने की परंपरा शुरू हुई। इस तरह यह नृत्य भक्ति और कला का माध्यम बन गया।

इस नृत्य की खासियत क्या है?
गोटीपुआ नृत्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे सिर्फ 14 साल या उससे कम उम्र के छोटे लड़के ही करते हैं। ये लड़के महिलाओं की तरह साड़ी, गहने और पारंपरिक शृंगार धारण कर नृत्य करते हैं।
यह नृत्य ‘बंध कला’ में किया जाता है, जिसमें योग की मुद्राएं और एक्रोबैटिक्स शामिल होते हैं। नर्तक अपने शरीर को बेहद लचीले तरीके से मोड़कर कठिन योग मुद्राएं बनाते हैं और ह्यूमन पिरामिड जैसी आकृतियां प्रस्तुत करते हैं। शारीरिक लचीलापन और ताकत इस नृत्य की बुनियाद है।

गोटीपुआ के गीतों में ओड़िया कवियों, खासकर बनमाली दास के भजन गाए जाते हैं। ये भजन मुख्य रूप से राधा-कृष्ण के प्रेम, रासलीला और भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति भाव को व्यक्त करते हैं। संगीत में पखावज, हारमोनियम और बांसुरी जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।

कैसे सीखा और किया जाता है यह नृत्य?
गोटीपुआ नृत्य सीखने के लिए छोटे लड़कों को महज 5-6 साल की उम्र में ही अखाड़ा भेज दिया जाता है। वहां उन्हें शरीर का लचीलापन बढ़ाने और शारीरिक शक्ति विकसित करने के लिए कठोर अभ्यास करना पड़ता है। साथ ही उन्हें शास्त्रीय संगीत की भी शिक्षा दी जाती है। सिर्फ 14-15 साल तक के लड़के ही इस नृत्य को मंच पर प्रस्तुत करते हैं। उम्र बढ़ने के बाद वे आमतौर पर इस परंपरा से हट जाते हैं।
नृत्य की शुरुआत भगवान जगन्नाथ और गुरुओं की वंदना से होती है। इसके बाद नर्तक ओडिसी शैली में अपने हाथों, आंखों और चेहरे के भावों के जरिए राधा-कृष्ण की कथाएं प्रस्तुत करते हैं। नृत्य का सबसे चुनौतीपूर्ण और आकर्षक हिस्सा वह होता है जब कई लड़के एक साथ मिलकर श्री कृष्ण के रथ, कमल के फूल या कालिया नाग दमन जैसी जटिल शारीरिक आकृतियां बनाते हैं। इसके लिए शरीर में अत्यधिक लचीलापन और सामंजस्य की जरूरत होती है।

गोटीपुआ नृत्य ओडिशा की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न सिर्फ भगवान जगन्नाथ के प्रति गहरी भक्ति को दर्शाता है, बल्कि छोटे बच्चों के कठोर अभ्यास, अनुशासन और कला के प्रति समर्पण की मिसाल भी पेश करता है। आज भी पुरी और ओडिशा के कई इलाकों में यह परंपरा जीवित है और पर्यटकों व कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।
 

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